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Explainer: अमेरिका ने ईरानी पोर्टों की नाकेबंदी क्यों की? होर्मुज के बाद मलक्का पर क्यों है ट्रंप की नजर?

 Published : Apr 15, 2026 02:13 pm IST,  Updated : Apr 15, 2026 02:13 pm IST

अमेरिका ने ईरानी पोर्टों की पूरी नाकाबंदी कर दी है। अमेरिका ने ऐलान किया है कि वह ईरान से चीन को एक बूंद भी तेल नहीं जाने देगा।

होर्मुज। - India TV Hindi
होर्मुज। Image Source : AP

Explainer: अमेरिका ने अप्रैल के दूसरे हफ्ते में ईरान के बंदरगाहों पर नौसैनिक नाकेबंदी (ब्लॉकेड) लागू कर दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कदम तब उठाया, जब पाकिस्तान में अमेरिका-ईरान शांति वार्ता विफल हो गई। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने 13 अप्रैल से ईरानी बंदरगाहों में आने-जाने वाले सभी जहाजों को रोकने की घोषणा की। हालांकि, गैर-ईरानी बंदरगाहों (जैसे सऊदी, यूएई, कतर) के जहाजों को मुक्त निकासी की अनुमति है। होर्मुज के बाद अब ट्रंप की नजर मलक्का जलडमरूमध्य पर है। 

नाकेबंदी क्यों की गई?

ट्रंप प्रशासन का मुख्य लक्ष्य ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना है। ईरान अपनी आय का बड़ा हिस्सा तेल निर्यात से अर्जित करता है, जो कि उसकी जीडीपी का लगभग 13% है। ईरान ने इजरायल और अमेरिका से युद्ध के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर रखा है और जहाजों से टोल वसूल रहा है। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति में 20% की कमी आई है। ट्रंप का कहना है कि ईरान दुनिया को “ब्लैकमेल” कर रहा है। लिहाजा अमेरिका ने ईरान के सभी बंदरगाहों का ब्लॉकेड करने की घोषणा की। तेहरान के पोर्टों की नाकेबंदी का अमेरिकी उद्देश्य ईरान के तेल निर्यात (लगभग 1.5-2 मिलियन बैरल प्रति दिन) को रोकना, ताकि उसके पास युद्ध जारी रखने के लिए पैसे न रहें।


चीन पर होगा व्यापक असर

ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी और होर्मुज में अमेरिका-तेहरान की भिड़ंत से माहौल लगातार खराब होता जा रहा है। चीन जैसी देशों को ईरान से बेहद सस्ता तेल मिलता है। चीन ईरान के 90% तेल का खरीदार है। लिहाजा अमेरिका चाहता है कि चीन ईरान का एक बूंद भी तेल नहीं पा सके। अमेरिका के ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा- अब चीन एक बूंद भी ईरानी तेल नहीं ले पाएगा। यह ईरान और उसके सहयोगियों पर दबाव की रणनीति मानी जा रही है। इससे चीन में ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है। हालांकि ऐसी स्थिति में रूस ने चीन की ऊर्जा जरूरतें पूरा कराने का भरोसा दिया है।

होर्मुज जलडमरूमध्य कितना महत्वपूर्ण है?

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण “चोक पॉइंट” है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। युद्ध से पहले यहां से रोजाना 20-21 मिलियन बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरते थे, जो कि वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20% था। साथ ही LNG (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) का भी बड़ा हिस्सा यहीं से सप्लाई होता था। इसमें 80-90% तेल एशिया (चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया) जाता है। अगर यहां अमेरिका का पूरा नियंत्रण या लंबी रुकावट हुई तो वैश्विक तेल आपूर्ति को भारी झटका लगेगा।

भारत समेत दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। वह 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है यानी लगभग 5.5 मिलियन बैरल प्रति दिन। भारत ने हाल ही में 7 साल बाद ईरान से फिर तेल आयात फिर शुरू किया था, लेकिन मात्रा बहुत कम है। इसलिए प्रत्यक्ष नुकसान सीमित रहेगा। हालांकि इसका अप्रत्यक्ष असर जरूर हो सकता है, क्योंकि होर्मुज से भारत का 70% तेल, 90% LPG और करीब 20% LNG गुजरता है। अगर नाकेबंदी बढ़ी या ईरान ने जवाबी कार्रवाई की तो आपूर्ति बाधित होगी। इसका असर पूरी दुनिया पर होगा। ऐसी स्थिति में भारत में भी पेट्रोल-डीजल, LPG सिलेंडर और परिवहन महंगा हो जाएगा। ऐसे में महंगाई बढ़ेगी, औद्योगिक उत्पादन प्रभावित होगा, खाद्य पदार्थों की कीमतें चढ़ेंगी। अगर होर्मुज पूरी तरह प्रभावित हुआ तो 2-2.3 मिलियन बैरल प्रति दिन अतिरिक्त आपूर्ति रुक सकती है। कीमतें $130 प्रति बैरल या उससे ऊपर जा सकती हैं, जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति बढ़ेगी।


होर्मुज के बाद मलक्का पर अमेरिका की नजर

मलक्का जलडमरूमध्य दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थित एक संकरा समुद्री मार्ग है। यह मलेशिया (मलय प्रायद्वीप) और इंडोनेशिया (सुमात्रा द्वीप) के बीच स्थित है, और इसके पास सिंगापुर भी है। यह हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ता है।
इसकी सबसे संकरी जगह केवल 2.8 किलोमीटर (लगभग 1.5 समुद्री मील) चौड़ी है। यह दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री जलडमरूमध्य है, जहां से हर साल 80,000 से अधिक जहाज गुजरते हैं। वैश्विक व्यापार का लगभग 40% इसी रास्ते से गुजरता है। दुनिया का लगभग 25-30% तेल और बहुत सारा LNG (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) भी यहीं से गुजरता है। चीन के 80% से ज्यादा तेल आयात, साथ ही जापान, दक्षिण कोरिया, भारत और अन्य एशियाई देशों का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है। चीन इसे अपना “मलक्का डिलेमा” (Malacca Dilemma) कहता है, क्योंकि यह उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी है।

मलक्का क्यों है महत्वपूर्ण?

होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान-अमेरिका तनाव और नाकेबंदी के बाद अब अमेरिका की नजर मलक्का जलडमरूमध्य पर भी बढ़ गई है। अमेरिका ने हाल ही में इंडोनेशिया के साथ एक नया रक्षा समझौता किया है, जिससे उसे इंडोनेशियाई हवाई क्षेत्र में ज्यादा पहुंच मिल गई है। इससे अमेरिका मलक्का स्ट्रेट पर 24 घंटे निगरानी रख सकता है। अमेरिका का उद्देश्य चीन की आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) को नियंत्रित रखना है। अगर होर्मुज पूरी तरह बाधित रहा तो एशिया के लिए वैकल्पिक रास्तों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसके अलावा इंडो-पैसिफिक रणनीति के तहत स्वतंत्र और खुला समुद्री मार्ग बनाए रखना भी अमेरिका की प्राथमिकता है। अमेरिकी युद्धपोत नियमित रूप से खासकर मिडिल ईस्ट की ओर जाते समय मलक्का से गुजर रहे हैं।
भारत के लिए भी यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का अंडमान-निकोबार द्वीप समूह मलक्का के पश्चिमी मुहाने के पास स्थित है। 

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